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Lyrics

07 JAHAN KHELAT HO.mp3


Album: KAHEN KABIR I (2006)

जहां खेलत हो

जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज जहां अनहद बाजा बजै बाज।
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज -2

चहुं दिसि जोति की बहै धार-2 बिरला जन कोई उतरे पार।-2
कोटि कृष्ण जहँ जोड़े हाथ -2 कोटि विष्णु जहां नावैं माथ।-2
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज जहां अनहद बाजा बजै बाज।
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज -2

कोटिन ब्रह्मा पढ़ै पुरान -2 कोटि महेश जहां धरै ध्यान।-2
कोटि सरस्वती जहं धरै राग -2 कोटि इन्द्र जहं गगन लाग।-2
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज जहां अनहद बाजा बजै बाज।
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज -2

सुर-गंर्धव-मुनि गनै ने जांय-2, जहं साबह प्रगटे आँय आप -2
चोबा चंदन और अबीर -2, पुहप रास रस रहियो गंभीर। -2
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज जहां अनहद बाजा बजै बाज।
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज -2

परमात्मा गुरू निकट विराजे जाग जाग मन मेरे। -2
धाय की पीतम चरनन लागै -2, साईं खड़ार सिर तेरे।-2
जुगन जुगन तोहि सांवत बीता, अजहंू न जाग सवेरे।
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज-2 जहां अनहद बाजा बजै बाज।-2
जहां खेलते हो बंसंत ऋतुराज -2



विवरण - जहां खेलत हो
कबीरदास जी ने अपनी आत्मा के साक्षात्कार का विविध वर्णन इन शब्दों में दिया:
‘‘सूरज, चांद और तारों के चिराग जल रहे हैं। प्रेम का राग वैराग्य के ताल और सुर पर गूंज रहा है। शून्य, गमन में दिन रात नौबत बज रही है। मेरा सांईं आकाश में बिजली की तरह चमक रहा है। वहा ंक्षण भर की और पल भर की आरती कहां। सारा संसार रात-दिन आरती उतारता है और गीत गाता है। तबल और निशान बज रहे हैं। एक अमर संगीत की झंकार सुनाई दे रही है, मानों त्रिलोक महल के प्रेम बाजे बन रहे हो। वहां बिना पानी के कमल खिला हुआ दिखाई देता है और चित्त का भौंरा उसका रस पी रहा है। कबीर जी का संदेश है कि सत्य केवल वेदों व अन्य किताबों के अध्ययन का विषय नहीं है, बल्कि वह तो अनुभवगम्य है। अतः अरे मानव, युग-युगों की निंद्रा स ेअब तो जाग। सवेरे का सूरज तुझे पुकार रहा है।



TRANSLATION - Gurudev - Ravindranath Tagore

Where spring, the lord of the seasons, reigneth there the unstruck Music sounds of itself. There the streams of light flow in all directions; few are the men who can cross to that shore! There, where millions of Krishna stand with hands folded. Where millions of Vishnu bow their heads. Where millions of Brahmas are reading the Vedas where millions of Shivas are lost in contemplation, Where millions of Indras dwell in the sky. Where the demigods and the munis are unnumbered, where millions of Saraswatis, Goddess of Music, play on the Veena –
There is my Lord self revealed and the scent of sandal and flowers dwells in those deeps. O my heart! The Supreme Spirit, the great Master, is near you; wake, oh wake! Run to the feet of your beloved; for your Lord stands near to your head. You have slept for unnumbered ages; this morning will you not wake?